Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 78, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 78, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 78 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
विपुलाद्यतनाकाशविपुलानम्बुबुदुदान् ।
सद्वस्रसंख्यान्कलयंल्लोचनानीव वासवः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
उस समुद्र में जो बुलबुले उठ रहे थे, वे उनके
भीतर स्थित प्राणियों की दृष्टि से चाँदी के कड़ाहे के सदृश प्रतीत हो रहे थे, ये इतने विपुल थे कि
इस प्रसिद्ध आकाश के सदृश थे, ओर ये ठीक समुद्र के नेतरो के सदृश प्रतीत हो रहे थे, इन सहस्र
नेत्रं से वह एसे देख रहा था, जैसे इन्द्र