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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 78, Verses 26–27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 78, verses 26–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 78 · श्लोक 26,27

संस्कृत श्लोक

एकार्णवपयःपूरैर्घर्घरारावरंहसि । त्रैलोक्यखण्डसंहारे प्रोह्यमाणे महाम्भसि ॥ २६ ॥ नासीत्कश्चित्परित्राता हन्ताऽवीचिवशोऽपि च । शक्नोति कः परित्रातुं कालेन कवलीकृतम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

एकमात्र समुद्रो के जलो की उस बाढ़ से घर्घरशब्दयुक्त, अतिवेगशाली सम्पूर्ण त्रैलोक्य के खण्डो के संहारक, बेरोक-टोक बहाये जा रहे उस महासागर में उस समय कोई संरक्षक नहीं था ओर ऐसा भी कोई प्राणी या पदार्थ न था, जो कि उसकी तरगों की चपेट में न आ गया हो, यह दुःख की बात है । हे श्रीरामजी, इस संसार में काल के गाल में पड़े हुए प्राणी की कौन रक्षा कर सकता है ?