Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 78, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 78, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 78 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
उह्यमानदलत्स्वर्गखण्डक्रन्दन्नभश्चरः ।
वहद्विद्याधरीवृन्दपद्मिनीसुन्दरान्तरः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें बढ़ते हुए छिन्न-भिन्न स्वर्गं के अनेक खण्डों में देवतारूपी अनेक हंस विद्यमान
थे । एकमात्र यही कारण था कि उसका आभ्यन्तर बहती हुई विद्याधरियों की पंक्तिरूपी पद्मिनी से
बहुत ही सुन्दर दिख रही था