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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 79, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

इत्येतदभविष्यच्चेत्तच्छरीरकसंक्षये । नाभविष्यदयं सर्गः स चास्त्येव च सर्वदा ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

पिता आदि का शरीर जिर देह का कारण है उम्र देह को भी सर्वथा असद्रप माननेपर तो (=) देखिये यह श्रुति - तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः । सूक्ष्मशरीरस़मष्टिर॒प हिरण्यगर्भ को भी असरूप होने में कोर अड़चन न होगी और उस दशा में उनकी स्र्यादि-अर्थकिया भी |मिथ्या ही चिद्ध होगी, यह कहते हैं । हे श्रीरामचन्द्रजी, इस रीति से यदि यह सब असद्रूप होता, तो पूर्वसृष्टि के प्रलय के अन्त में सब शरीरों का सर्वथा क्षय होने पर इस सृष्टि के आदि काल में शरीर हेतुक शरीर न रहने से यह सृष्टि भी न होती । और यह सृष्टि सबकी आँखों के सामने सर्वदा विद्यमान हैं ही (इसलिए यह सृष्टि नहीं है, यह कोई कहने का साहस नहीं कर सकता)