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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 79, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

देहकारणकः स्वप्नो देहाभावान्न दृश्यते । इति चेत्तददेहानां परलोकोऽपि नास्ति च ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

फिर भी इस विषय में स्वप्न का द्ष्टान्त तो उचित नहीं है, क्योकि यह जो वर्तमान शरीर हैं इसमें पिता आदि का शरीर कारण हैं, परन्तु स्वप्नशरीर तो एसा नहीं हैं / स्वप्नशरीर के अत्यन्त अस्दगप होने से यह विषम दुष्टान्त है, ऐसी परिस्थिति में प्रतिवादी को नास्तिक कहलाने के लिए तैयार रहना होगा, यह कहते हैं / इस शरीर का कारण पिता आदि का शरीर है, इसलिए यह दिखाई देता है, किन्तु स्वाप्निक शरीर का कारण तो पिता आदि का शरीर नहीं है, इसलिए वह नहीं दिखाई देता, यदि कोई यह शंका करे, तो उसकी यह शंका ठीक नहीं है, क्योंकि तब तो उसके मत से इस पार्थिव शरीर से रहित प्राणी का, जो यज्ञादि के द्वारा स्वर्गीय शरीर प्राप्त करनेवाले हैं उनका परलोक भी नहीं है । ऐसी दशा में हमें उसको नास्तिक कहने मेँ तनिक भी संकोच न होगा