Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 79, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अपह्नुते च वा योऽपि स्वमेवानुभवं शठः ।
स त्याज्यः को ह्यलीकेन सुप्तमुद्वोधयेत्किल ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह अपने तथा दूसरें के अनुभव से सिद्ध स्वप्न के बाध का जो अपलाप करता है यानी
स्वप्नावि सम्पूर्ण दृश्यप्रपंच को सत्यस्वरूप स्वीकार करता हैं, उको तत्त्वज्ञानोपदेश देने की कुछ
श्री आवश्यकता नहीं है-वह प्रकोध के योग्य हे ही नहीं; यह कहते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, जो शठ स्वयं अपने को तथा दूसरों के अनुभव को भी स्वीकार नहीं करता
अर्थात् अपने तथा दूसरों के अनुभव से सिद्ध स्वप्न के बाध का अपलाप करता है वह त्याज्य है,
इसमें तनिक भी सन्देह नहीं, क्योंकि मिथ्या सुप्त पुरुष को यानी सचमुच न सोये हुए पुरुष को
भला कौन उठा सकता है ?