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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 79, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

न चैतदिष्यते लोके जगदुच्छेदकारणात् । अन्यच्चास्तामेतदङ्ग ममेदमपरम श्रृणु ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे कथन को लोक में विद्वान लोग स्वीकार नहीं करते, क्योकि बिना कारण और प्रयोजन के सृष्टि आदि का संभव न होने से तुम्हारे मत के अनुसार तो जगत्‌ का उच्छेद प्रसंग अनिवार्य होगा । किंतु, देहात्मवाद मे क्या सभी अवयव ही आत्मा हैँ या अवयवी ही ? प्रथम पक्ष मेँ तो यह दोष आता है कि अनेक चेतनो में सर्वदा ऐकमत्य न होने से वैमत्य के कारण देह का सभी अवयव उन्मथन करने लग जायेंगे । अब रह गया दूसरा पक्ष, उस पक्ष में यह दोष आता हे कि हाथ आदि किसी एक अवयव के कट जाने पर अवयवी का नाश हो जाने से जीवन का ही अभाव हो जायेगा - इत्यादि और भी हजारों दोष हैं ही, यह सब अलग रहे । हे चार्वाक, इस मेरे कथन से कायाकार में परिणत भूतसंघात में मदशक्ति की नाई ज्ञप्तिगुण पैदा हो जाता है, यह जो तुमने कहा है उसका भी उत्तर हो गया ओर भी तुम अपने मत में मेरा यह एक दूसरा दूषण सुन लो