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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 79, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

मदशक्त्यात्मनि ज्ञाने दृष्टा देशान्तरेषु या । प्रसृतानां पिशाचादिदेहता सा न सिध्यति ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि ऐसा मान लिया जाय कि जैसे मदशक्ति-आत्मक द्रव्य में मदशक्ति विद्यमान रहती है वैसे ही भूतसंधात में, जो कि ज्ञानस्वभाव है, ज्ञानगुण रहता है तब तो गुणी देह का नाश हो जाने पर गुण का भी अवश्य नाश हो जाने से (दूसरे देशों में मरे हुए जीव देह के नष्ट हो जाने पर अपने देश में पिशाचादि का शरीर धरकर कैसे चले आते हैं तथा दूसरों के शरीरों में प्रविष्ट होकर अपने पूर्वजन्म के आत्मीयो को पहचान कर उनके साथ बातचीत आदि कैसे करते हैं अर्थात्‌) प्रदेशान्तर में मरे हुए व्यक्तियों की पिशाच आदि देहता जो लोक में प्रसिद्ध हैं वह सिद्ध न होगी