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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 79, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

तस्मात्स्वभावः प्रथमं प्रस्फुरन्वेत्ति संविदम् । वासनाकारणं पश्चाद्बुद्ध्वा संपश्यति भ्रमम् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि वह चावकि यह कहे कि कायाकार में परिणत हुए शर्वो से संवित्‌ क्रा उद्भव होता है, इसलिए शरीर के नष्ट हो जाने पर मृत प्राणी को पारलौकिकी बुद्धि ही न उत्पन्न होगी, तो इसपर उक्ते कहना यह चाहिये कि हे मित्र, सवित्‌ शाश्वत हैं, स्वतः सिद्ध हैं, प्रस्तुत उसकी प्रिद्धि के बल से ही वासनामय आतिवाहिक देह, तत्कल्पित स्थुल देह तथा बराह्मप्रपंच की पीछे धिद्धि होती है / वासना के सिवा कोर्ड अन्य दृश्यप्रपंच की पभ्रिद्धि में हेतु नहीं हैं, इसलिए संवित्‌ की उत्पत्ति देह के अधीन नहीं है / यह सुधित करते हुए महाराज वस्िष्ठजी उस बावकि के प्रति कवन का उपसंहार करके (वासनाया विलीनायामदर्शनयुपायता: “ इत्यादि श्लोक से पहले जो यह उपक्रम किया गया है कि एकमात्र वासना के क्षय से ही सम्पूर्ण दृश्य का उच्छेद होता है इस उठाई यह बात का समर्थन करने के लिए प्रस्ताव करते हैं / इसलिए (५) ज्ञानस्वभाव परमात्मा स्वप्रकाशस्वरूप होने से स्फुरित होते हुए समस्त व्यवहार से पहले निजस्वरूपभूत संवित्‌ को जानता है जो स्वतः नित्यसिद्ध है, जैसे अग्नि अपनी उष्ण्यप्रकाशरूपता को जानती है । उसके बाद वासनाओं की उत्पत्ति में उपादान कारण सर्वजगत्‌ की वासनामय आतिवाहिक देह को जानकर फिर स्थूल देहादि संसार के भ्रम को देखता है । कहने का तात्पर्य यह है कि सबसे पूर्वसिद्ध संवित्‌ की सिद्धि देह के अधीन नहीं है