Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 79, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
विज्ञानघन एवायं कचनाकचनात्मकः ।
स्वयमेव कचत्यन्तर्न कचत्येव वा स्वयम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
विज्ञानघन यह आत्मा
ही प्रकाशात्मक और अप्रकाशात्मक भी है । ज्ञात होने पर यह स्वयं ही स्वप्नरूप से अन्दर स्फुरित
होता है तथा ज्ञात न होने पर यानी श्रुति आदि प्रमाण लाभ के पहले यह बिल्कुल स्फुरित नहीं
होता