Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 79, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
ततो मुहूर्तमात्रेण दृष्टवानहमब्जजम् ।
पुरो विनिद्रतां यातः स्वप्नदृष्टमिवाग्रगम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके बाद मुहूर्तमात्र में मैंने सामने ब्रह्माजी को ऐसे देखा, जैसे सोकर उठा हुआ पुरुष
स्वप्न में देखे गये पदार्थों को अपने सम्मुख उपस्थित देखता है । कहने का तात्पर्य यह कि
जाग्रतअवस्था में स्वाप्निक पदार्थों का जैसे बाध होकर केवल आत्ममात्र परिशेष रह जाता है वैसे
ही मैंने ब्रह्माजी को आत्ममात्र परिशेष ही देखा वही विधाता का विदेह केवल्य है