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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 8, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 8, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

भुशुण्ड उवाच । विद्याधर धराधारो गिरिकन्दरमन्दिरः । दिगन्तराम्बराचारचारसंचारचञ्चरः ॥ १ ॥ ईदृशोऽयं जगद्वृक्षो जायतेऽहंत्वबीजतः । बीजे ज्ञानाग्निनिर्दग्धे नैव किंचन जायते ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

एवोक्त सारी वृक्ष का पुन: वर्णन करते हैं / भुशुण्डीजी ने कहा : हे विद्याधर, जिसका मूलभाग नीचे के सात लोकसहित यह पृथिवी है, इसकी आलबालसहित वेदि लोकालोकान्तर पर्वतों की कन्दराएँ हैं और जो दसों दिशाओं और आकाश में तिरछे शाखाओं के विस्तार तथा उसकी ओर शाखाओं के प्रसार से एवं तत्‌-तत्‌ स्थानों मे प्राणियों के जहाँ-तहाँ घूमने से अतिचंचल है, इस तरह का यह संसाररूपी वृक्ष अहंकाररूपी बीज से उत्पन्न होता है । ज्ञानरूपी अग्नि से बीज के दग्ध हो जाने पर कुछ भी उत्पन्न नहीं होता

सर्ग सन्दर्भ

सातवाँ सर्ग समाप्त आठवाँ सर्ग इस संसाररूपी वृक्ष का ज्ञान से उच्छेद तथा यह संसार संकल्पमण्डप के सदृश है, इसका वर्णन ।