Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 8, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 8, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
प्रेक्ष्यमाणं च तन्नास्ति किलाहंत्वं कदाचन ।
एतावदेव तज्ज्ञानमनेनैव प्रदह्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
रत्न की परीक्षा की नाई तत्त्वदृष्टि से यह क्या है, इसका अच्छी तरह विचार करके
“यह केवल ब्रह्म ही है” यह निश्चय करने पर वह अहंकार कदापि कहीं नहीं रहता, बस यही वह
ज्ञान हे । इसीसे अहंकार दग्ध होता हे