Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 8, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 8, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
असत्यमेव स्फुरति सर्वमस्ति च नास्ति च ।
असदुत्थित एवायं कुतोपीव समुत्थितः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जो कुछ यहाँ स्फुरित हो रहा है वह सब असत्यरूप ही है । वह प्रतिभास
से सत्य प्रतीत हो रहा है, परन्तु परमार्थरूप से तो बिलकुल है ही नर्ही । यह असत् ही उत्पन्न
हुआ है; न जाने कहाँ से माया के हाथी, घोडे की नाई यहाँ उत्पन्न हो गया है