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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 8, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 8, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

सर्गादावेव सर्गस्य किलास्याभावयोगतः । कुतोऽहंत्वं कुतस्त्वंत्वं कुतो द्वित्वैक्यविभ्रमः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

सत्‌ या असद्‌ से जिसकी उत्पत्ति की ही संभावना नहीं है उसकी स्थिति ही कहाँ से हो सकती है, वह तो बहुत दूर कहीं भगा दी ग्ड है, ऐसा कहते हैं । वस्तुतः जब सृष्टि के प्रारम्भ में ही इस सृष्टि के अभाव का योग है तब कहाँ से अहन्ता, कहाँ से त्वन्ता और कहाँ से हो सकता हे द्वित्व एकत्व का भ्रम ?