Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
सर्वभूतनरैः सार्धं ब्रह्मणा परमेयुषा ।
यदासौ संपरित्यक्तस्तदा स्वां मूर्तिमागतः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
तब इस तरह की मूर्ति से वह पहले क्यो न देखा गया, यदि यह आशंका हो, तो इसका
उत्तर यह है कि वराचर नागरूपात्मक कार्यो के आकारो के अध्यारोप से व्यामृढ्रद्गष्टि होने के
कारण उसके अन्तर्गत कारणस्वभाव का दुर्ग्रह होने से ही वह उम्र तरह की मूर्ति से युक्त न
दीख पड़ा, इस्र आशय से कहते हैं /
जैसे अपने में अध्यारोपित कार्यरूप पट तन्तु का परित्याग कर देता है, वैसे ही चार प्रकार के
शरीरों तथा तत्-तत् जीवों के साथ प्रलयकाल में परमकारण मायाशबल ब्रह्म को प्राप्त हुए
चतुर्मुख ब्रह्माजी ने जब उसका भी परित्याग कर दिया तब वह पूर्वोक्त आकाश मात्रपरिशेषरूप
वर्णित अपनी मूर्ति मे आ गया । अर्थात् कारणरूप अपनी मूर्ति में स्फुट हो गया । कहने का तात्पर्य
यह है कि कारण स्वभाव के दुर्ग्रह से ही वह इस तरह की मूर्ति से पहले न दीख पड़ा