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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

सर्वसत्त्वोपलम्भात्मा स्वभावोऽस्य प्रयोजनम् । ईरितः शिवरूपेण चिन्मात्राकाशरूपिणा ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

{कि प्रयोजनः“ इस प्रश्न का उत्तर कहते हैं / स्वरचित सम्पूर्ण जीवों को अपने-अपने कर्मों के अनुसार विषयभोगरूप उपलब्ध विहित क्रमशः ज्ञानसाधनप्राप्ति के अन्त में स्वात्मतत्त्व की उपलब्धिरूप जो शास्त्रीय विहित और निषिद्ध कर्मो के ज्ञान एवं फल देने का स्वभाव है वही सृष्टि आदि में प्रयोजक होने से उसका प्रयोजन है अर्थात्‌ समस्त जीवों को उनके तत्‌-तत्‌ कर्मों के अनुसार विषयफल प्रदान करने का तथा अधिकारी पुरुषों को ज्ञान प्रदान करने का जो स्वभाव है वही उस परमेश्वर का सृष्टि आदि में प्रयोजन है (&)