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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verses 31–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verses 31–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 31,32

संस्कृत श्लोक

तेनैव च निगीर्णः सन्परमां शान्तिमेत्यसौ । निर्मलाकाशरूपाप्मा कृष्ण इत्येष ईश्वरः ॥ ३१ ॥ कृत्वा कल्पं जगत्सर्वं तत्पीत्वैकार्णवं तदा । स प्रयाति परां शान्तिमभूयःसंनिवृत्तये ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

भाव यह कि सर्वश्नत्तोपलम्धरूप स्वभाव ही उसका प्रयोजन है, और कुछ नहीं / चिन्यात्रआकाशरूप शिवस्वरूप परमात्मा यानी वाणी और मनके अगोचर निरतिशय ध्रूमानन्दात्मक परम कल्याणमय स्वरूप परमात्मा स्वयं अपने से ही बहुस्यां प्रजायेय” इस संकल्पात्मक मायावृत्ति द्वारा एक से बहुत होने की इच्छा से प्रेरित होकर जगत्‌ की रचना करता हैं / और उक्ती अपने चित्स्वरुप से प्रलय के लिए स्वयं प्रेरित होकर स्र्यक्रम के विपरीत .क्रमसें जयत्‌ को निगल कर यानी स्वविरचित जगत्‌ का सहार कर आकाशरूप से स्थित हो जाता है / तदनन्तर स्वयां भी वह अपने उरी परम कल्याणमयरूप से निगीर्ण होता हुआ अपने उस्र आकाशभाव का भी परित्याय करके श्रूगानन्दस्वरूप ग्रतिष्ठारूप परम शान्ति करे प्राप्त हो जाता है / कि क्ष्णः“ इत्यादि सी प्रश्नों का उपपत्तिपूर्वक जो उत्तर दिया गया है उसका स्मरण कराते हुए अब महाराज वरिष्टजी उयसहार करते हैं / निर्मल चिदाकाशरूप यही परमेश्वर महाकाल रुद्र का रूप धारण कर प्रलय लाकर के सारे जगत्‌ को एक महासागर के रूप में परिणत कर देता है और जब सारा ब्रह्माण्ड एकमात्र महासागर के रूप में परिणत हो जाता है तब उस महासागर का जल पीकर पुनः शरीर न धारण करने के लिए परमशान्ति को प्राप्त होता है