Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
बहिः किं विद्यते ब्रह्मन्ब्रह्मसद्मकटाहतः ।
कास्तत्रावरणा ब्रूहि कियत्यः संस्थिताः कथम् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, आवरणयुक्त उन ब्रह्माण्डखप्परों
के बाहर क्या है ? उनके कौन-कौन आवरण है ? वे कितने हैं तथा बिना आधार के वे
सब वहाँ संस्थित कैसे हैं कृपाकर यह कहिये