Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ब्रह्माण्डखण्डयोः पारे ततो दशगुणं जलम् ।
संध्याकाशमनन्तं तद्वर्जयित्वा ततः स्थितम् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
इन चार ग्रश्नों में पहले बीच के दो प्रश्नो का उत्तर देते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, उन ब्रह्माण्डखण्डों के पार में उनसे दश गुना
अधिक विस्तृत जल है । और वह जल इन दोनों खण्डों के अति विस्तृत सन्ध्याकाश को छोड़कर
उसके बाहर ही खूब विस्तृतरूप से स्थित है