Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

अन्यत्रान्यत्र तस्याथ दृष्टयोऽन्यास्तथैव खे । कचन्त्यनन्ता दूरस्था मिथो दृष्टात्मसृष्टयः ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

आकाश से परे उसे दशयुना अधिक अहंकारतत्व, उसने दशयुना अधिक महत्त्व और उसके आगे अनन्त प्रकृति का वर्णन जो पुराण आदि में मिलता ह. उसका यहाँ परित्याग क्यो किया 2 इस शंका पर कहते हैं । हे श्रीरामचन्द्रजी, उस मायाशबल ब्रह्म के स्वरूपाकाश में योगि-माहेश्वर पांचरात्र तथा कपिल आदि तन्त्रो में महत्‌, अहंकार आदि तत्त्वभेद के आवरण के विषय में भिन्न-भिन्न कल्पनादृष्टियाँ अनन्तरूप से स्फुरित हो रही हैं। किन्तु परस्पर विवादग्रस्त देखी गई उनकी स्वरूपकल्पना की सृष्टियाँ पुराणों में मिलती हैं, श्रुतियों में नहीं, इसलिए हमने उनकी उपेक्षा कर दी है, इसका तात्पर्य यह है कि अन्य-अन्य योगी, महेश्वर पांचरात्र तथा कपिल आदि के मत के अनुसार मायाशबलित ब्रह्माकाश में महत्तत्त्व आदि दृष्टि की कल्पनाएँ भी एक-एक से दशगुना अधिक हैं लेकिन परस्पर विवादग्रस्त होने से हमने उनकी उपेक्षा कर दी है