Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स पार्थिवपदार्थानां स्थितः पुष्करपत्रवत् ।
भागस्तमेवाधावन्ति ते सुता मातरं यथा ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, पार्थिव पदार्थो का जो भाग
ब्रह्माण्डखमप्पर है वह कमलपत्र के समान स्थित है । उसी भाग का वे आधारादि भाव से ऐसे
आश्रय करते हैं, जैसे वानरी के शिशु अपनी माँ का । अर्थात् जैसे वानरी के बच्चे अपनी माँ
को पेट में अच्छी तरह पकड़ के दौड़ने पर भी नहीं गिरते, वैसे ही इनकी भी स्थिति है ।
अथवा उस ब्रह्माण्डखप्पर की ओर उसकी आकर्षणशक्ति से आकृष्ट होकर वे ऐसे दौडते हैं,
जैसे वानरी के बच्चे अपनी माँ की और दौड़ते हैं