Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
अतो यदेव नेदीयो ब्रह्माण्डाख्यं महावपुः ।
तत्पदार्थाः प्रधावन्ति तृषिताः सलिलं यथा ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
उम्र ब्रह्माण्डखप्पर के ऊपर स्थित जल के न गिरने में भी यही न्याय है, इस आशय से
कहते हैं।
इसलिए हे श्रीरामजी, ब्रह्माण्डनामक जो महाशरीर अत्यन्त समीप है उसकी ओर वे सब
पदार्थ ऐसे दौडते हैं, जैसे प्यासे प्राणी जल की ओर