Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अधृतं धृतमेवोच्चैरपतच्चैव वा पतत् ।
अनाकृत्येव साकारं जगत्स्वप्नपुरं यथा ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जो आधारादि की चिन्ता हो रही है, सो स्रत्यतादृष्टि में ही हैँ / मिथ्याद्ृष्टि में तो जो
अत्यन्त भारी पदार्थ हैं उनके भी आधार आदि का क नियम नहीं है, यह स्वप्नद्रब्टान्त से
वस्तिष्ठजी उत्तर देते हैं
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, यद्यपि इसको किसी ने धारण नहीं किया है,
फिर भी परमात्मा की अचिन्त्य धारणात्मिका शक्ति से यह अच्छी तरह धारण किया हुआ है ही ।
यह बिलकुल गिरता हुआ भी नहीं गिर रहा है । हे श्रीरामचन्द्रजी, यह सम्पूर्ण जगत् वस्तुतः
आकृतिशून्य (निराकार होनेपर भी) स्वप्ननगर के सदृश साकार है