Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
ब्रह्मन्ब्रह्माण्डखण्डे ते तिष्ठतः कथमुच्यताम् ।
किमाकृती धृते केन कथं वा परिनश्यतः ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
ओर आवरणों के आधारथूत दोनों ब्रह्माण्डखप्परों का, जो भारी होने से अवश्य गिर जानेवाले
हैं; आधार क्या हैं 2 यह श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं /
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, आप कृपाकर यह मुझसे कहिये कि वे ब्रह्माण्डखण्ड कैसे
अवस्थित रहते हैं उनका आकार क्या है ? किसने कैसे उन्हें धारण कर रक्खा है ? अथवा वे
गिरकर नष्ट कैसे होते हैं ?