Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
यथा केशोण्ड्रकं व्योम्नि यथा च व्योम्नि शून्यता ।
यथा वा पवने स्पन्दो जगच्चिद्गगने तथा ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे आकाश में केशोण्ड्रक श्यामता है तथा जैसे आकाश में शून्यता
है एवं पवन में जैसे रपन्दन है, वैसे ही चिदाकाश में यह जगत् है