Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
स्थितसंवित्समुद्भूतं तिष्ठदास्ते दिवानिशम् ।
उत्पतन्त्या चितोद्भूतमुत्पतच्चैव तिष्ठति ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
स्थिति के अध्यास से
युक्त संवित् से समुद्भूत यह संसार सदा अवस्थित है तथा उर्ध्वगमनमयी चिति से उद्भूत यह
संसार निरन्तर ऊर्ध्वगमनोन्मुख ही बना रहता है (५)