Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
पातसंवित्समुद्भूतं पतदास्ते दिवानिशम् ।
गच्छन्त्या संविदोद्भूतं गच्छदास्ते दिवानिशम् ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण पदार्थो का नियत या अनियत स्वभाव संवेदन के अनुसार ही प्रिद्ध होता है, यह
कहते हैं।
पतन के अध्यास से युक्त संवित् से उत्पन्न यह जगत् रात-दिन गिरने में तत्पर है तथा
गमन-अध्यास से युक्त संवित् से यह रात-दिन गमन में ही तत्पर है