Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
आभाति मौक्तिकगणः शरदम्बरान्तर्दृष्टावसत्य उदितोऽप्यतिसत्यरुपः ।
भ्रान्त्या यथा नभसि च स्फुरतां तथैषां संख्यां विधातुमिह को जगतां समर्थः ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे
श्रीरामचन्द्रजी, जैसे शरत्कालीन आकाश की ओर देख रहे पुरुष की दृष्टि बेर के आकार के सदृश
असत्य मोतियों का समूह सत्य-सा भासता है, वैसे ही असत्य ही उदित यह संसार अतिसत्यस्वरूप-
सा भास रहा है । चिदाकाश में ये जितने जगत् भ्रान्ति से स्फुरित हो रहे हैं, ठीक-ठीक उन सबकी
गणना करने में भला कौन समर्थ है ?