Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 100
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 100 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 100
संस्कृत श्लोक
एवंविधानां स्रग्दामजालानां कुसुमोत्करम् ।
किरन्ती संसृजन्तीव नृत्तक्षुब्धं क्षयक्षतम् ॥ १०० ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, इस तरह के नानाविध
पुष्पमालासमूहों के फूलों को, जो नृत्य में क्षुब्ध तथा भंगसे क्षत हो जाते थे, बिखेरती हुई तथा
नूतन बनाती हुई-सी नाच कर रही थी