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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 102

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 102 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 102

संस्कृत श्लोक

डिंबं डिबं सुडिंबँ पच पच सहसाझम्य झम्यं प्रझम्यं नृत्यन्ती शब्दवाद्यैः स्रजमुरसि शिरःशेखरं तार्क्ष्यपक्षैः । पूर्णं रक्तासवानां यममहिषमहाशृङ्गमादाय पाणौ पायाद्वो वन्द्यमानः प्रलयमुदितया भैरवः कालरात्र्या ॥ १०२ ॥

हिन्दी अर्थ

रक्त एवं आसवों से पूर्ण यमराज के महिष का महान्‌ सींग हाथ में लेकर डिब, डिब, सुडिंब, पचपच, झम्य, झम्य, प्रझम्य आदि तालबोधक शब्दवाद्यों के द्वारा भगवती एकदम नाच रही थी, उसने अपने गले मे मुण्डो की माला पहिनी थी, सिर में गरुड के पंख धारण किये थे, प्रलय में सारे जगत्‌ को खाकर बडी ही प्रसन्न हुई थी, और कल्पान्तरुद्र भगवान भैरव को नमन भी कर रही थी । इस तरह नृत्यपरायण एवं प्रसन्न भगवती कालरात्रि के द्वारा वन्द्यमान भगवान्‌ भैरव आपका कल्याण करें । (अथवा इस श्लोक का दूसरा यो भी अर्थ हो सकता हैं- देवी कालरात्रि भगवान्‌ भैरव की स्तुति कर रही थी-हे भैरव, आप सब लोगों के अनर्थकात्मक भोग एवं स्थूल शरीरादि प्रफव को सबसे पहले खा डालिए फिर चर्म शरीर आदि ग्रप॑च को खा डालिए, फिर मूलभूत मायोपाधि एवं कारण शरीर को भी अन्तिम साक्षात्कार में आकर खा डालिए / उसके बाद पंचम आदि योग की भूमिकाओं में लगाकर शीघ्र ही सप्तम श्रुमिका तक के योग को भलीभॉति पचाकर विदेह कैवल्य के द्वारा जला डालिए / यों उस तरह नाच कर रही भगवती के साथ-साथ आपके द्वारा स्तुति किये जा रहे भयवान्‌ भैरव आपकी रक्षा करे)