Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
क्षणमेकभुजाकारा क्षणं बहुभुजाकुला ।
अनन्तोग्रभुजाक्षिप्तजगन्नर्तनमण्डपा ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
क्षण मेँ ही कभी तो वह एक भुजा से युक्त आकारवाली हो जाती थी ओर कभी क्षण
में ही अनेक भुजाओं से व्याप्त हो जाती थी तथा कभी क्षण भर में ही अपनी अनन्त उग्र भुजाओं
से जगद्रूपी नृत्यमण्डप को ऊपर फेंककर व्याकुल कर देती थी