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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

लोकालोकेन्द्रनीलोग्रश्वभ्रभीमहनुद्वया । वातस्कन्धगुणप्रोततारामुक्ताकलापिनी ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके दोनों जबड़े तो लोकालोक पर्वत के प्रसिद्ध इन्द्रनील के उग्र गड्ढे की तरह ही भयंकर दीख रहे थे, क्योकि अधिक गहरा होने से वहाँतक कुण्डलो की कान्ति का प्रकाश बिलकुल नहीं पहुँच पाता था । वातस्कन्ध्रूपी तागों में पिरोये गये तारागणरूपी मुक्ताकलापों की माला उसके गले में विराज रही थी