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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

इन्द्रनीलाद्रितुल्योच्चतोरणोच्चैःप्रभाम्बरे । विश्रान्तकाचशैलाभभगभीषणवायसी ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

इन्द्रनील पर्वत के तुल्य ऊँचे नगर के बाहर के दरवाजे पर पद्मराग आदि की प्रभा से रंजित दरवाजे के उन्नत भीतरी छेद में विश्रान्त अधोमुख कृत्रिम काचशैल की तरह भगनामक भीषण काक से वह भयंकर लगती