Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
नखपुष्पाङ्गुलीवल्लीजालैर्भ्रान्तभुजद्रुमैः ।
कृष्णैः काननिताशेषगगनाग्रोग्रमूर्तिभिः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
रंग
में बिलकुल काले अतएव उग्र स्वरूप के अपने उन भ्रान्तभुज -वृक्षों से, जो नखोंरूपी पुष्पों से
विभूषित अंगुलरूपी लतासमूहों से सुशोभित थे, उस भगवती काली ने सारे आकाशप्रान्त को
जंगल-सा बना दिया था