Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
तमालतालतः स्थूलां भुवं दग्धमहावनैः ।
विडम्बयन्ती वलितां जङ्घासङ्घेन लोलता ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
वह भगवती काली सभी ओर चलित हुए अपने जंघासमूह से, जले
(०) अर्थात् स्फुरित हो रही प्रभाओं से युक्त हाथी के दाँतों की तरह पर्वत-प्रान्त के ऊपर
महा प्रभाओं से युक्त मोटी-मोटी जल-धाराश्रेणी को बरसा रहे कल्पान्त मेघो की तरह ।
हुए खजूर आदि के महान् जंगलों से वलित तथा एकमात्र जले हुए अच्छे-अच्छे तमाल, ताल आदि
के वृक्षों से स्थूल बनी हुई पृथिवी का अनुकरण कर रही थी