Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
ततो नृत्तवशावेशाद्वर्धमानशरीरिणी ।
मया दृष्टावधानेन गगनाभोगभूरिणा ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके बाद मैंने आकाश में स्थित अनन्त आकाश के सदृश व्यापकरूप उस
भगवती को योगबल से देखा कि वह नृत्यवश आवेश के कारण वर्द्धमान शरीरवाली हो गयी
हैं