Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
कर्णयोर्हिमवन्मेरू रूप्यकाञ्चनमुद्रिके ।
ब्रह्माण्डघुंघुमैर्माला महती कटिमेखला ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
हिमालय तथा सुमेरु
पर्वत उसके दोनों कान की चाँदी और सोने की मुद्रिका ({)) बनकर शोभा बढा रहे थे । ब्रह्माण्डों
की घुंघुम शब्दों से परिपूर्णं माला एक लम्बी लच्छेदार करधनी थी