Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
जङ्गमात्मैकमेवैतज्जगदस्थावरं तदा ।
नृत्यतीति मया ज्ञातं परलोके सुखं स्थितम् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, सारा संसार उसके नर्तन में कोप रहा था, इसलिए कोई भी पदार्थ स्थावर
(स्थिर) तो था ही नहीं, किन्तु केवल जंगमात्मक ही यह जगत् उस समय प्रतीत हो रहा था, पहले
नष्ट होकर इसके शरीररूपी परलोक में सुख से स्थित सारा जगत् नाच रहा है, यह मैंने जाना