Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
विभान्ति सृष्टयस्तस्या घर्माणि जलजालिकाः ।
इव नीहारहारिण्या नीलवारिदवाससः ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, कालरात्रि ने नीहार के तो हार पहिने थे, उसके वस्त्र
नीले मेघ थे, इसलिए मेघो से बरसाये गये जो जलबिन्दु थे, वे उसके स्वेदबिन्दु की तरह मालूम
पड़ते थे