Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
सुरासुरोरगानीकरोमशाङ्गः शरीरकः ।
निस्पन्दं स्थातुमशकन्नसौ भ्रमति चक्रवत् ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी,
वे सुर, असुर, नाग आदि के समूह ही भगवती के रोम थे, इसका शरीर स्पन्दनरहित होकर
ठहर सकता ही नहीं था, इसलिए चक्र की तरह वह बराबर घूम रहा था