Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
तरदद्रिगुलुच्छास्ता वलयन्त्या तया स्रजः ।
पुनः कल्पान्त आरब्ध इव ताण्डवहेलया ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
उड़ रही
पर्वतरूपी मंजरियों से युक्त पूर्ववर्णित ब्रह्माण्डमाला का इधर-उधर परिवर्तन करती हुई उस
भगवती ने अपनी ताण्डव-लीला से मानों फिर महाप्रलय आरम्भ किया