Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 66
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 66
संस्कृत श्लोक
तत्र भूतलमाकाशमाकाशमपि भूतलम् ।
प्रतिकृतिं भवत्यन्तर्न च किंचिद्विवर्तते ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
वस्तुतः उस नृत्य में कुछ भी नहीं हिल रहा था परन्तु भूतल और आकाश चक्र के चमकने
से एक के एक दूसरे में प्रतिबिम्बित होकर एक दूसरे के सदृश वे दोनों बन जाते थे इससे कुछ
समय के लिए भूतल आकाश बन जाता था ओर आकाश भूतल बन जाता था, यह देखनेवालों
की एक भ्रान्ति ही थी