Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 77
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 77 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 77
संस्कृत श्लोक
व्योम्नि भ्रमन्ति गिरयोऽम्बुधयो दिगन्ते लोकान्तराणि पुरपत्तनमण्डलानि ।
नद्यः सरांसि मुकुरान्तरिव प्रवृद्धवातावकीर्णतृणविक्रमणक्रमेण ॥ ७७ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, आकाश में पर्वत घूम रहे थे, दिशाओं में समुद्र घूम रहे थे, पुर, नगर, मण्डल, नवियाँ,
सरोवर-ये सब अपने आश्रयभूत लोक से लोकान्तर में, दर्पण के भीतर-जैसे, प्रविष्ट होकर-
झंझावात के द्वारा असंकीर्ण तृणों का उडना जैसे लोक में विख्यात है, वैसे ही-उड रहे थे