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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 76

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 76 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 76

संस्कृत श्लोक

अब्धिर्नृत्यति पर्वते गिरिरपि प्रोच्चैर्नभःकोटरे व्योमापीन्दुदिवाकरैः क्व चलितं भूमेरधस्ताद्गतम् । सद्वीपाचलपत्तनो वनगणः प्रोत्कीर्णपुष्पो दिवि व्यालोलं जगदम्बुधाविव तृणं दिक्चक्रके भ्राम्यति ॥ ७६ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, एक और आश्चर्य सुनिये - उसकी देह में पर्वत पर समुद्र नाच रहा था, वह पर्वत ऊँचे आकाशकोटर में नृत्य कर रहा था, वह आकाश भी चन्द्र और सूर्यो के साथ पृथ्वी के नीचे चलित होकर कहाँ चला गया, यह जाना ही नहीं गया । नानाविध पुष्पों से युक्त तथा द्वीप, अचल एवं नगर से समन्वित वनगण सूर्यमण्डल में नाच रहा था - यों चंचल जगत समुद्र में चंचल तृण के समान दिशाचक्र में भ्रमणकर रहा था