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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verses 74–75

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verses 74–75 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 74,75

संस्कृत श्लोक

विशदाकाशसंकाशे स्वप्नाञ्जनपुरोपमे । अङ्गे तस्या बृहज्जङ्घे पिण्डादित्यसमत्विषि ॥ ७४ ॥ विन्ध्यो नृत्यति काञ्चनाचलवने सह्यश्च सह्यो गिरिः कैलासो मलयो महेन्द्रशिखरी क्रौञ्चाचलो मन्दरः । गोकर्णो गगनाङ्गणे वसुमती विद्याधराणां पुरं सर्वे जंगमतां गता वनभुवस्तस्याः शरीरे सदा ॥ ७५ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवती का शरीरांग विशद्‌ आकाश के सदृश विशाल था, स्वप्न में उत्पन्न महान अंजन पर्वत के सदृश था तथा एक पिण्ड में बने हुए बारहो आदित्यो के सदृश तो उसकी कान्ति थी, विशाल उसकी जंघाएँ थी, इस प्रकार के उसके अंग मेँ कहीं पर सुवर्ण पर्वत के ऊपर उगे जंगल में अपना चिरन्तन वैर निकालते हुए-सा विन्ध्याचल नाच रहा था, तो कहीं गगनरूप आंगन में अपने शत्रु विन्ध्याचल को न सहने योग्य सह्य कैलास, मलय, महेन्द्रपर्वत, क्रौच पर्वत, मन्दर ओर गोकर्णं पर्वत मानों कोप-से नाच रहे थे, इनके पक्षपात से सारी वसुमती ओर विद्याधरो के नगर नाच रहे थे । इस तरह उसके शरीर में सभी स्थावर जंगमभाव को प्राप्त हो गये थे