Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 81
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 81 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 81
संस्कृत श्लोक
रत्नानि भास्करनिशाकरमण्डलानि तारोत्करास्तरलमण्डलकान्तिहाराः ।
स्वच्छाम्बराणि वलितानि महाम्बराणि कुर्वन्त्यनारतमनल्पमलातलेखाः ॥ ८१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राघव उसकी देह
में सूर्य, चन्द्र आदि के मण्डल तो रत्न बन गये थे, नक्षत्रसमूह तरल वर्तुलाकार शोभा से युक्त गले
के हार के सदृश बन गये थे, अत्यन्त स्वच्छ गगनमण्डल पहिने हुए महान् वर्त्र बन गये थे । इनमें
भ्रमण कर रही विद्युत अलातचक्र-सी प्रतीत हो रही थी और निरन्तर महान प्रकाश कर रही
थी