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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 82

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 82 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 82

संस्कृत श्लोक

कल्पान्तकालविलुठत्त्रिजगन्मणीनि व्यावर्तनैर्झगिति जातझणज्झणानि । तेजांसि झंकृततयोर्ध्वमधश्च यान्ति नानाविधानि गुणवन्ति विभूषणानि ॥ ८२ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवती के नृत्य कल्पान्तकाल में लुढक रहे तीनों जगत्‌ ऊपर-नीचे परिवर्तनं के कारण तत्काल ही झनझन ध्वनि करनेवाली मणियों के रूप में बन गये । इंकार से ऊपर-नीचे गमन कर रहे सूर्य आदि तेज अनेक तरह के गुणयुक्त (सूत्र-युक्त) नूपुर, वलय आदि भूषण के रूप में बन गये