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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 91

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 91 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 91

संस्कृत श्लोक

क्रियाशक्तिः शरीरेऽन्तः पूर्यमाणा अनारतम् । राशीभूय विशीर्यन्ते जगन्मुद्गकणोत्कराः ॥ ९१ ॥

हिन्दी अर्थ

सव पदार्थों का उत्पादन करने के निष कारकों की क्रियाशक्ति उपयोग में आती है. आगे के भावविकार तो स्वयं ही काल आनेपर उत्पन्न हो जाते हैः जैसे मूग इकट्ठे करने हों. तो कारकक्रियाशक्ति की आवश्यकता होती है, परन्तु विशीर्ण होकर फैलने में तो उनकी स्निग्धता ही कारण है, न कि अन्यकारक क्रियाशक्ति, ठीक ऐसे ही यहाँ समझना चाहिए, यह कहते हैं / भगवती की देह में क्रियाशक्ति है, अतएव उसके द्वारा उसमें निरन्तर भरे जा रहे जगत-रूपी मूग के दाने ढेर के रूप में पहले होकर फिर विशीर्णं हो जाते हैं यानी चारों ओर फैल जाते हैं