Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 92
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 92 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 92
संस्कृत श्लोक
क्षणमालक्ष्यते किंचिन्न किंचिदपि सा क्षणम् ।
क्षणमङ्गुष्ठमात्रैव क्षणमाकाशपूरिणी ॥ ९२ ॥
हिन्दी अर्थ
माया भगवती परिणामि-स्वभाव जड़ जयत्रुपा होने के कारण ही प्रतिक्षण अन्य-अन्य
रूपकी प्रतीत होती हैं, यह कहते हैं /
भगवती माया एक क्षण में तो कुछ मालूम पड़ती है और दूसरे क्षण में वैसी नहीं भी मालूम
पड़ती है, एक क्षण में एक अँगूठे के बराबर प्रतीत होती है, तो दूसरे क्षण में आकाश को भी भर देने
वाली मालूम पड़ती है